ना दिला पाया ....पत्नी के नाम | आलोक सिंह भारद्वाज

ना दिला पाया .......!

मेरी प्रिय पत्नी के नाम

शादी के आठ बसंत बीत गए,
कितने सपने साथ जी लिए।
अपनी कही हुई बातों को,
हमने मिलकर याद किए।

आज तीज के इस पावन पर्व पर,
कुछ शब्द तुम्हारे नाम लिखे हैं।
जो दिल में था, जो कह न सका,
वो भाव आज इन पंक्तियों में रखे हैं।

ना घर दिला पाया,
ना कार दिला पाया,
ना पाजेब, ना गले का हार दिला पाया।

ना कोई बड़ी खुशी,
ना कोई बड़ा त्योहार दिला पाया,
जो सपनों में था तुम्हारे,
ना वो सुख-संसार दिला पाया।

जो दिला पाया,
उसमें मेरी कोई मेहरबानी नहीं,
जो आपने पाया,
वो आपकी मेहनत है, कोई खानदानी नहीं।

आपकी आँखों में जो सपने हैं,
उनका हर रंग निराला है।
आपके त्याग और समर्पण ने,
मेरे जीवन को सँभाला है।

खुशी होती है देखकर,
आपका हर छोटा-बड़ा समर्पण।
आपका ये प्रेम,
मेरे आत्मचिंतन का है दर्पण।

ना दिला पाया बहुत कुछ,
इसका मलाल रहेगा।
पर आपके प्रेम का ये ऋण,
मेरे जीवन भर साथ चलेगा।

— आलोक सिंह भारद्वाज

 

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