मृदु भाषी हो तो मधुर बोलो.....!
मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, ये कटुता कहाँ से लाते हो। बार-बार और हर बात में तुम, क्यों दूसरों को गालियाँ सुनाते हो। तुम जो हो, वो पता है मुझे, फिर मुझको क्यों बताते हो। मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, ये कटुता कहाँ से लाते हो। अपने-गैर, ऊँच-नीच का, ये भेद तुम्हीं बढ़ाते हो। जब काम निकल जाता अपना, फिर जोर-जोर से मुस्काते हो। हमने देखा है वो सब करके, जिससे तुमको जान सकूँ। चेहरा तो देखा ही है मैंने, बस भीतर से पहचान सकूँ। आदमी अच्छे हो, ये पता है मुझे, पर आदत तुम्हारी बहुत बुरी है। एक तरफ मुँह में शक्कर रखते, एक तरफ धारदार छुरी है। अरे इंसान हो, इंसानियत रखो, रिश्तों में कोई व्यापार नहीं। हर चीज़ तो मिल जाती है, मिलता बस अच्छा व्यवहार नहीं। मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, मन में प्रेम जगाते चलो। शब्दों से रिश्ते बनते हैं, शब्दों से मत उन्हें तोड़ो। -आलोक सिंह भारद्वाज