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मृदु भाषी हो तो मधुर बोलो.....!

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मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, ये कटुता कहाँ से लाते हो। बार-बार और हर बात में तुम, क्यों दूसरों को गालियाँ सुनाते हो। तुम जो हो, वो पता है मुझे, फिर मुझको क्यों बताते हो। मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, ये कटुता कहाँ से लाते हो। अपने-गैर, ऊँच-नीच का, ये भेद तुम्हीं बढ़ाते हो। जब काम निकल जाता अपना, फिर जोर-जोर से मुस्काते हो। हमने देखा है वो सब करके, जिससे तुमको जान सकूँ। चेहरा तो देखा ही है मैंने, बस भीतर से पहचान सकूँ। आदमी अच्छे हो, ये पता है मुझे, पर आदत तुम्हारी बहुत बुरी है। एक तरफ मुँह में शक्कर रखते, एक तरफ धारदार छुरी है। अरे इंसान हो, इंसानियत रखो, रिश्तों में कोई व्यापार नहीं। हर चीज़ तो मिल जाती है, मिलता बस अच्छा व्यवहार नहीं। मृदुभाषी हो तो मधुर बोलो, मन में प्रेम जगाते चलो। शब्दों से रिश्ते बनते हैं, शब्दों से मत उन्हें तोड़ो। -आलोक सिंह भारद्वाज 

टूटी टहनी का सन्देश

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आपस में प्यार पूरा था, दिल जिसके बिना अधूरा था। रिश्तों में जो अधूरा था, उसे भी पूरा किया गया। पर मानो किसी की नज़र लगी, एक पल में वह सब टूट गया। अब टूट गया तो टूट गया, इस पर इतना क्या रोना है? टूटे पेड़ों की टहनी देखो, तने से निकलते आँसू देखो। तने में लगे पत्तों को देखो, दोनों को ऐसा लगता होगा— जुड़े रहते तो हरे रहते, तने के साथ खड़े रहते। चारों ओर हरियाली होती, आँधी आती, रखवाली होती। पर तना ज़रा घबराया था, टहनी के टूट जाने से। कंधों पर भार उठाया था, हर आँधी के आ जाने से। आँधी का आना तो तय है, फिर टूट जाने का भय है। क्या टहनी टूट जाने पर पेड़ इतना शोक मनाता है? क्या बीती बातों को कोई इतनी बार दोहराता है? अरे, उठो चलो, फिर शुरू करो, कई फल नए उगाना है। नए पत्तों और टहनियों को पेड़ बनकर दिखाना है! -आलोक सिंह भारद्वाज