देखना जरुर !

                                                                                                                 देखना ज़रूर !

जब मंज़िल तय हो,

तो बस—
सीधा देखो,
और चलते चले जाओ।

रुको मत,
थको मत,
बस आगे बढ़ते जाओ।

लाख अँधेरों के बीच
अगर
रौशनी की
एक किरण भी दिखे—
उसकी ओर ही सही,
मगर चलते जाओ।

दरवाज़े बंद मिलें,
तो खिड़की से देखना।



खिड़कियाँ भी
बंद मिलें,
तो तलाशना
रौशनदान।

और अगर
रौशनदान भी न मिले—
तो देखना
अपने अंतर्मन के
नेत्रों से।

मगर…
देखना ज़रूर।

क्योंकि
रास्ते हमेशा
दिखाई नहीं देते—

कभी-कभी
उन्हें देखने की
इच्छा ही
उन्हें जन्म देती है।

और वही रास्ते
धीरे-धीरे
हमें वहाँ ले जाते हैं—

जहाँ
हमारी मंज़िल
हमारा इंतज़ार कर रही होती है।

— आलोक सिंह भारद्वाज


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