भविष्य देख सकता है - आदमी

भविष्य देख सकता है - आदमी 


कहते हैं—

कोई अपना भविष्य नहीं देख सकता।

मैं कहता हूँ—
देख सकता है।

हर वो आदमी देख सकता है
जो चलना चाहता है।

जो चलते-चलते
धूप में जलना चाहता है,

पानी में बहना चाहता है,

और लोगों की
शिकवा-शिकायतों को
सहना चाहता है।

सोचो—

क्या तुम तैयार हो?

तैयार हो
अपने पैरों के नीचे की
सड़क बदलने के लिए?

तैयार हो
अपने चेहरे पर पड़ती धूप को
आईना मानने के लिए?

देखना चाहते हो
बाहर की दुनिया?

उसके रंग?

उसके तरह-तरह के ढंग?

तो फिर—

चलो।

शुरू करो।

आज से।

अभी से।

कोई शिकवा नहीं।

कोई शिकायत नहीं।

न बीते हुए कल से,
न इस वर्तमान से।

न मंदिर से,
न श्मशान से।

न हिन्दू से,
न मुसलमान से।

न खेत से,
न खलिहान से।

न पड़ोसी से,
न खानदान से।

शिकायत करनी ही है
तो करो—

अपने अकेले होने के डर से।

अपने भीतर पलती
उस झूठी शर्म से।

हर दिन दोहराए जाने वाले
उन गलत कर्मों से,
जिन्हें तुम जानते हो
फिर भी करते हो।

शिकायत करो
अपने उस डर से
जो तुम्हें चलने नहीं देता।

उस झूठ से
जो तुम्हें खुद से मिलने नहीं देता।

उस बहाने से
जो हर रात तुम्हारे सिरहाने बैठकर
कहता है—

“कल से शुरू करेंगे।”

नहीं।

कल नहीं।

आज।

अभी।

क्योंकि भविष्य
कहीं आसमान में लिखा हुआ
कोई बंद दरवाज़ा नहीं है।

भविष्य तो
तुम्हारे आज के कदमों से
बनता हुआ रास्ता है।

बस—

जान लो अपने आप को।

पहचान लो
अपने भीतर उठते जज़्बात को।

सुनो उस आवाज़ को
जो भीड़ में भी
सिर्फ तुम्हें पुकारती है।

फिर देखना—

शायद वो सब मिलेगा
जिसके लिए
तुम्हारी नींद

अचानक—

आधी-आधी रात को

खुल जाती है।

-आलोक सिंह भारद्वाज 

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